राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ एव अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग सस्थान, आगरा के शोध के मुख्य कार्यक्षेत्र कुष्ठ रोग (40 प्रतिशत), क्षयरोग एव अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग के सबधित क्षेत्र (40 प्रतिशत), एचआईवी (10 प्रतिशत) एव फाइलेरियासिसराइसिस आदि (10 प्रतिशत) है। 1966 मे यह सस्थान इण्डिया सेन्टर आॅफ जैपनीज लैप्रोसी मिशन फाॅर एशिया (जालमा) के रूप मे स्थापित हुआ था। 1976 मे भारत सरकार व भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसधान परिषद (आईसीएमआर) को हस्तातरण होने पर एक शोध इकाई के रूप मे अपनी स्थापना के बाद इस सस्थान के वैज्ञानिको ने कुष्ठ रोग के विभिन्न पहलुओ को बेहतर समझने के लिए क्लीनीकल, इलेक्ट्रोफिजियोलोजी, इम्यूनोलोजी, पैथोलोजी, माॅलीक्यूलर बायोलोजी, बायोकैमिस्ट्री एव इलेक्ट्रोन-माइक्रोस्कोपिक इत्यादि विधियो/तकनीको का प्रयोग करके कार्य किया है। हिस्टोलोजीकल निदान मे सुधार के लिए जीन प्रोब्स एव इनसीटू विधियो के विकास पर सस्थान द्वारा विशेष कार्य किया गया है। माउस फुट पैड सबधी अध्ययनो को जारी रखने तथा और अधिक मजबूत बनाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे है। औषधि प्रतिरोधकता की जाॅच के लिए नये युग की माॅलीक्यूलर विधियो पर सस्थान ने विशेष योगदान दिया है, और यह अभी भी चल रहे है। सस्थान स्तर पर विभिन्न औषधि रेजीमिन डिजायन किए गये और उनकी जाॅच की गई जिसके द्वारा प्राप्त परिणाम कुष्ठ रोग के चिकित्सकीय उपचार के क्षेत्र के लिए बहुमूल्य प्रमाणित हुए है। इस प्रकार के प्रयास अब क्षय रोग मे भी किये जा रहे है जिनके दूरगामी परिणाम होने की आशा है। क्षय रोग के अध्ययनो मे औषधि प्रतिरोधकता, माॅलीक्यूलर एपिडिमियोलोजी एव उपचार कि नई विधियो पर विशेष बल दिया जा रहा है। औषधि पारगम्यता (पर्मिएबिलिटी) एव औषधि मेटाबाॅल्जिम के शोधो से नई एव मौलिक जानकारियाॅ प्राप्त हो रही है। कुष्ठ रोग से जुड़ी हुई समस्याओ मे शल्यक्रिया प्रबन्धन के अध्ययनो द्वारा विकृतियो को ठीक करने एव पादतल अल्सर जैसी मुख्य समस्याओ की रोकथाम के लिए शोध कार्य किये जा रहे है। क्षयरोग की व्यापकता, कुष्ठ एव अन्य माइकोबैक्टीरियल रोगो के सक्रमणो के फैलाव की प्रकिया एवम् कारणो का पता लगाने मे माॅलीक्यूलर विधियो द्वारा जाॅच कार्य ने विशेष प्रगति की है। इस प्रकार कुल मिलाकर क्षयरोग एव कुष्ठ रोग मे औषधि प्रतिरोधकता की जाॅच के कई अध्ययन जारी है। इन शोध कार्याे ने कई नई माॅलीक्यूलर तकनीकियो (जीन प्रोब्स, डीएनए चिप्स) के विकास मे योगदान दिया है। बैक्टीरिया के साथ-साथ हाॅस्ट जैनेटिक्स पर भी अध्ययन जारी है। सस्थान एड्स के क्षेत्र मे भी नये शोध क्षेत्रो को परख रहा है जिसमे एचआईवी एव कुष्ठ रोग तथा एचआईवी एव क्षय रोग के बीच सबधो पर अध्ययन सम्भावित है।
सस्थान मे अत्यत आधुनिकतम् प्रयोगशालाएॅ जैसे - बीएसएल-3 प्रयोगशाला (एक-माइक्रोबायोलोजी एव माॅलीक्यूलर बायोलोजी और अन्य एनीमल अध्ययन के लिए), माइक्रोऐरे सुविधा, डीएनए के साथ-साथ प्रोटीन सिक्वेसिग, प्रोटियोमिक्स सुविधा, लोसाइटोमैट्री प्रयोगशालाएॅ इत्यादि स्थापित की गई है।
नई तकनीको को जन साधारण तक पहुॅचाने के लिए सस्थान ने आगरा, कानपुर एव बादा मे कई अध्ययन किए है और उन्हे पिछले वर्षो मे काफी उन्नत किया है। सस्थान ने घाटमपुर के साथ-साथ आगरा मे भी फील्ड कार्यक्रम स्थापित किए है। विभिन्न स्थलो पर रोगो से बचाव, फैलने की प्रक्रिया एव उसके प्रभाव के अध्ययनो पर भी कार्य चल रहा है। सस्थान ने हाल ही मे फाइलेरियासिस एव कुष्ठ रोग के बीच सबध पर भी अपना ध्यान केन्द्रित किया है। घाटमपुर की फील्ड इकाई को माॅडल ग्रामीण स्वास्थ्य शोध इकाई के रूप मे विकसित किया जा रहा है, जिसमे घाटमपुर मे मुख्य इकाई के साथ बादा एवम् अन्य क्षेत्रो मे सेटेलाइट केन्द्र भी होगे। कुल मिलाकर इस प्रकार सस्थान ने विभिन्न क्षेत्रो मे प्रयोगशाला से लेकर पीढ़ित व्यक्ति (फील्ड) तक तकनीकियाॅ पहॅुचाने के कार्यो पर विशेष ध्यान दिया है। कुल मिलाकर सस्थान ने न केवल त्वरित गति से सिर्फ आधुनिक माॅलीक्यूलर एव अन्य प्रयोगशालाएॅ जैसे पी-3, माइक्रोऐरे, प्रोटोमिक्स आदि स्थापित की है, बल्कि अन्य सस्थानो के प्रयोगकर्ताओ को उसी गति से तकनीको को हस्तान्तरित भी किया है।
उपरोक्त सभी प्रयासो से सस्थान ने कुष्ठ रोग एव माइकोबैक्टीरियल रोग शोध के क्षेत्र मे अपनी प्रधानता को स्थापित किया है। सस्थान द्वारा विभिन्न बहुकेन्द्रीय शोध अध्ययन अपने परिसर मे चलाये जा रहे है तथा कई शोध कार्यो मे सहयोग प्रदान कर रहा है। सस्थान माइकोबैक्टीरिया के लिए नेशनल रिपोजिटरी केन्द्र तथा एचआईवी जाॅच के लिए सन्दर्भ केन्द्र के रूप मे भी कार्य कर रहा है।
सस्थान द्वारा विभिन्न प्रशिक्षणो (एमडी/एमएस/पीएचडी/एमवीएससी/एमएससी इत्यादि) के माध्यम से आधुनिक तकनीक को जानने वाली मानव शक्ति तैयार की है और इस क्षेत्र मे अभी भी सस्थान अपने प्रयास जारी रखे है, जो भविष्य मे देश के लिए निश्चित रूप से बहुत उपयोगी होगी।
सस्थान के विभिन्न वैज्ञानिको का विशेषज्ञो के रूप मे योगदान भी परोक्ष रूप से देश के शोध कार्यो के विकास के लिए अत्यन्त लाभदायक रहा है और यह जारी रहेगे।
देशवासी इस सस्थान को हमेशा एक महत्वपूर्ण धरोहर के रूप मे देखे, यही लक्ष्य भारत सरकार, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसधान परिषद एवम् इस सस्थान के सभी कर्मचारियो के आगे रहेगा। सभी के सहयोग से यही गति बनी रहे, इस बात की कामना है।
डॉ. किरन कटोच
निदेशक |