| इस संस्थान की मूल स्थापना 1966 में ‘‘इण्डिया सेन्टर ऑफ जालमा’’ के रूप में की गई जिसे टोकियो (जापान) के एक स्वैच्छिक संगठन-जालमा (जैपनीज लैप्रोसी मिशन फॉर एशिया) द्वारा चलाया गया। यह संस्थान अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय संबंध एवं एक दूसरे के प्रति लगाव का उत्कृष्ट उदाहरण है।
01 अप्रैल 1976 को यह संस्थान अस्तित्व में आया जब इण्डिया सेन्टर ऑफ जालमा को अधिकारिक रूप से भारत सरकार को सौंपा गया और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद को हस्तांतरित किया गया। इस प्रकार 1976 में इसका नामकरण केन्द्रीय जालमा कुष्ठ रोग संस्थान के रूप में हुआ। वर्ष 2005 में विशाल शोध क्षेत्र के कारण इसका पुनः नामकरण राष्ट्रीय जालमा कुष्ठ एवं अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग संस्थान के रूप में हुआ ।
संस्थान ने आईसीएमआर के अधीन 30 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण कर लिया है। संस्थान के मुख्य कार्यक्षेत्र कुष्ठ रोग (40 प्रतिशत), क्षयरोग एवं अन्य माइकोबैक्टीरियल रोग के संबंधित क्षेत्र (40 प्रतिशत), एचआईवी (10 प्रतिशत) एवं फाइलेरियासिसराइसिस आदि (10 प्रतिशत) हैं। आईसीएमआर के अन्तर्गत शोध इकाई के रूप में अपनी स्थापना के बाद इस संस्थान के वैज्ञानिकों ने कुष्ठ रोग के सभी क्षेत्रों, क्षय रोग के चुने हुये क्षेत्रों (डीएनए फिंगरप्रिन्टिग विधियाँ, औषधि प्रतिरोधकता आदि), एचआईवी-एड्स के कुछ क्षेत्र एवं अन्य संबंधित क्षेत्र जैसे फाइलेरियासिसराइसिस में भी कार्य किया है और लगातार कर रहे हैं।
संस्थान के पास आधुनिकतम् बीएसएल-3 प्रयोगशालाएँ, डीएनए चिप (माइक्रोएरे) लैब, प्रोटियोमिक्स लैब के साथ-साथ कई अन्य पूर्ण सुसज्जित प्रयोगशालाएँ, आधुनिक अस्पताल के अतिरिक्त घाटमपुर एवं आगरा के लिए फील्ड कार्यक्रम हैं। घाटमपुर के कार्यक्रमों को एक माॅडल ग्रामीण शोध इकाई के रूप में विकसित करना इस संस्थान की प्रगति में एक नया स्तम्भ है। इस संस्थान ने कुष्ठ रोग एवं माइकोबैक्टीरियल शोध के क्षेत्र में अपनी प्रधानता को स्थापित किया है। यह संस्थान कुष्ठ एवं क्षय रोग पर विभिन्न बहु केन्द्रीय शोध अध्ययनों मंे भी अपना योगदान दे रहा है। |
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